सोमवार, 30 जनवरी 2017

गांधी वध या हत्या??

साहब वध हो या हत्या, जीव की जीवन लीला तो समाप्त हो ही जाती है। बस शब्दों के प्रयोग और अर्थ है कि हमें उलझाये रहते हैं। मगर अर्थ के साथ-साथ अंतर्निहित भाव को महसूस करना महत्वपूर्ण है। अब आप ही देखिये न, बकरीद में गाय काटी जाए तो उसे कुर्बानी कहते हैं और मांस व चर्म के लिए काटी जाए तो कत्ल कहते हैं! साहब बेचारी गाय तो बकरीद में भी मांस और चर्म के रूप में ही उपभोग की गई और बाद में भी! मगर कत्ल और कुर्बानी के नाम पर अलग-अलग तरह का बर्ताव हुआ। गाय मरी!

अगर हमारे देश के कुछ जलते हुए ऐतिहासिक प्रश्नों पर समीचीन और समग्रता से इमानदारी पूर्वक विचार करने से बचा गया है तो उसमें से एक प्रश्न गांधीजी के अंत से जुड़ा है। आज इस चर्चा में मैं पूरी गहराई में नहीं जाऊंगा क्योंकि आप सुधि पाठक की धैर्य-परीक्षा नहीं करनी। मेरे मन में कुछ छोटे-छोटे प्रश्न उठते रहते हैं। फिर यदा कदा उन्हें बहला फुसला कर शांत कर देता हूँ। परन्तु आज 30 जनवरी को इनके हलचल को शांत नहीं कर पा रहा हूँ। हम दोनों के पास समयाभाव है सो संक्षिप्त में ही - गांधीजी का वध हुआ या हत्या हुई??
साधारणतः इस प्रश्न का उत्तर खेमों में बंटे हुए विद्वान अपने खेमें की भूत से भविष्य तक की चिंता करने के बाद तदनुसार देते हैं। एक ऐसी स्थिति खङी कर दी जाती है कि सत्य का आभास भर हो मगर सत्योद्घाटन न हो। मेरा जन्म गुलाम भारत में नहीं हुआ। न सद्यस्वतंत्र भारत में। हमारी पीढ़ी तो 'लिब्रलाइजेशन' के बाद के भारत को देख रही है। फिर ऐसे प्रश्नों के लिए हम संबंधित पुस्तकों और अपने चिंतन शक्ति पर आश्रित हैं। उभय पक्ष को पढना, समझना और मनन करना होगा। गांधी जी के अंत को समझने के लिए 1946 से 1948 के भारत को देखना पड़ेगा। उस समय के कुछ महत्वपूर्ण घटनाओं की थोड़ी चर्चा करते हैं।

पाकिस्तान के निर्माण के लिए कलकत्ता को जिन्नावादीयों ने एक प्रयोगशाला के रूप में चुना क्योंकि यहाँ मुसलमानों की संख्या अधिक थी। 'बंगाल का प्रधानमंत्री' सुरावर्दी भी मुसलमान! 1946 साल 'द ग्रेट कलकत्ता किलिंग'!! आप कभी समय निकालकर विकिपीडिया में ही पढ लें। कहते हैं सुरावर्दी स्वयं उसकी मानिटरिंग कंट्रोल रूम से कर रहा था।खैर, शायद शहर था, लोग सक्षम थे। मंसूबे में सफलता नही मिली। परन्तु। हां जी परन्तु पाकिस्तान के निर्माण की प्रथम सफल प्रयोगशाला बनी - नोआखाली!!
अल्पसंख्यक हिन्दू थे। अत्याचारों की पराकाष्ठा से गुजर कर हिन्दू शून्य बनाया गया नोआखाली को। हिन्दूओं को इस विपत्ति से बचाने में कांग्रेस और गांधीजी असमर्थ रहे। पूर्णतः। शायद हिन्दू-मुस्लिम भाई-भाई की एकता और मुस्लिम लीग के राजनैतिक पेंच में फंसी रह गयी कांग्रेस और गांधीजी अहिंसा के नाम पर नोआखाली को कुर्बान कर दिये।
इधर पंजाब और काश्मीर जल रहे थे। सिंध, लाहौर, रावलपिंडी इन सब प्रांतों में मुस्लिम लीग ने अपना नोआखाली माॅडल लागू किया था। कांग्रेस और गांधीजी भी अपने-अपने माॅडल पर काम कर रहे थे।
आप जरा सोचिए तो कि जिस देश की जनता ने 1905 में बंगाल विभाजन को नहीं माना, वह किन परिस्थितियों में हिन्दुस्तान के विभाजन का दंश झेली होगी?
इन घटनाओं से देश की बहुसंख्यक जनता के मन में भय, अनिश्चितता, अनहोनी की आशंका और क्षोभ बढता जा रहा था। देश बंटा। कांग्रेस को सत्ता स्थानांतरित हुई। नेहरू व जिन्ना के स्वप्न साकार हुए मगर दिल टूटे लोगों के। संसार उजरा सिंध के व्यापारियों का। 'रावलपिंडी का बलात्कार' देखा दुनिया ने। रेलगाड़ियों ने लाशें ढोयीं। दिल्ली और बंगाल एवं निकटवर्ती प्रांत राहत शिविरों में तब्दील हो गए। ऐसी परिस्थिति में गांधीजी के पाकिस्तान को 55 करोड़ देने की जिद ने सरकार एवं चिंतनशील व्यक्तियों के माथे पर चिंता की लकीरें खींच दी। भारत सरकार का फैसला बदला मगर इन घटनाओं से उद्वेलित गोडसे का मन नहीं बदला। वह मन खंडित भारत को और पिङित हिन्दूओं की व्यथा को सह नहीं पाया। लगा राष्ट्रहित की बलिवेदी पर गांधी जी को बलिदान होना ही होगा। गोली चली। प्रार्थना के जगह निकला,
हे राम!!
इस बिखरे राष्ट्र को आजादी की लड़ाई में एक करने वाले शांति, सत्य और अहिंसा के साधक महात्मा का अंत हो गया हिंसा के रास्ते। गांधीजी ने इस देश को एक साझा स्वप्न दिया था। सभी के योगदान अमूल्य हैं। अतुल्य हैं।
गांधी जी ने गलती की या अपने सिद्धांतों के नाम पर कुर्बान होने दिया नोआखाली को, नेहरू मोह और कांग्रेस की एकता के नाम पर टूट जाने दिया दिलों को बंट जाने दिया भारत को? गांधीजी मजबूर हो गए थे। मेरा यह स्पष्ट मानना है कि मोह, सिद्धांत और राजनैतिक पेंच में फंस गए थे बापू।
इस त्रिकोणीय बाधा ने जनभावना और भारतहित को उनकी आंखों से दूर रखा।
नाथूराम गोडसे के कृत्य से मैं असहमत हूँ पर भावना से सहमत ठीक वैसे ही जैसे गांधीजी के पाकिस्तान को 55 करोड़ रुपये देने की जिद के पिछे की भावना से सहमत हूँ परन्तु अनशन से असहमत। मेरे इस मत से सहमति अथवा असहमति प्रार्थनिय नहीं है।
उभय पक्ष, तत्कालीन परिस्थिति और कृत्यों की भावना सब हमारे समक्ष हैं। अब वध हुई या हत्या हमें सोचना है।
'गांधीजी की शिक्षा और उनका तत्वज्ञान 'नामक पुस्तक में श्री राजगोपालाचारी लिखते हैं कि "सरदार पटेल के यह शब्द थे कि गांधी जी पाकिस्तान को 55 करोड़ देने का हठ कर बैठे, जिसका परिणाम उन्हें उनके वध से मिला"
मेरा भी यही मत है कि राष्ट्र की बलिवेदी पर एक महात्मा का प्राणोत्सर्ग हुआ। समाज में समता, समरसता, एकता और प्रेम का संदेश और अपने सत्य के प्रयोग से कभी नहीं डिगने वाले महात्मा गांधी को उनके शहादत दिवस पर शत शत नमन और आपके अंदर स्थित प्रज्ञ आत्म को प्रणाम करता हूँ।

गुरुवार, 12 जनवरी 2017

आओ साथी दीप बनें

सुबह-सुबह मोबाइल का अलार्म बज रहा था। अचानक हङबङा कर उठा। बगल में पङा हुआ था - उत्तीष्ठत जाग्रत! रात को सोते समय पढने की बिमारी है न! कन्याकुमारी में विवेकानंद शीला स्मारक के कर्मवीर माननिय एकनाथ रानाडे जी द्वारा संकलित स्वामी विवेकानंद की वाणी और लेखों का संग्रह।चेतना को अनुप्राणित कर देने वाला। ईवेंट रिमांइडर वाला एप्लिकेशन बता दिया - 12 जनवरी, युवा दिवस, स्वामी विवेकानंद का जन्मदिन!

कुछ कार्यक्रमों में शामिल होने का सौभाग्य मिला। स्वामीजी के सजाये हुए फोटो पर गणमान्य लोगों ने माल्यार्पण, पुष्पार्पण किया। प्रदीप जलाये गये।नारे लगे - स्वामी विवेकानंद, अमर रहे - अमर रहे ;विवेकानंद के स्वप्नों का भारत, हम गढेंगे - हम गढेंगे आदि आदि।
इन नारों के शोर में मेरा चंचल मन और चंचल हो गया। अनायास मैं नवोदय विद्यालय सिवान के एसेंबली हाॅल में चला गया। साल 2013। स्वामी जी का 150 वां जन्मदिन महोत्सव। "हमारे महापुरुषों को हमने पत्थर की मूर्तियों के रूप में चौराहों पर सजा दिया है। उनके जन्मदिन और पुण्यतिथि पर माल्यार्पण करने और फूल चढ़ाकर फोटो खिंचवाने का रस्म निभाते हैं हम। उनके जीवन का संघर्ष और उनके आदर्श हमारे जीवन से गायब हो गए हैं...." इतना स्मरण होते ही मेरी चेतना फिर लौट आती है। बच्चों के बीच खीर और जलेबी बांटा जा रहा है। मेरे कान में गूंज रहे हैं पी जी टी मैथ सर (श्री अवधेश कुमार शर्मा, जवाहर नवोदय विद्यालय, सिवान) के वो शब्द जो उन्होंने 150 वीं जयंती के अवसर पर कही थी।
प्रिय साथी 12 जनवरी को भारत सरकार ने 1985 में राष्ट्रीय युवा दिवस के रूप में घोषणा की थी। तब से आज तक अनुष्ठान वर्षानुक्रम से होते आ रहे हैं। हम भी कभी न कभी इसके साक्षी रहे होंगे। ऐसे अवसरों पर कार्यक्रमों का आयोजन और अन्य कर्मकांड आवश्यक हैं, उनका भी अपना महत्व और प्रभाव है परन्तु उससे भी ज्यादा आवश्यक है उस महापुरुष के आदर्शों का स्मरण, और तदनुसार यथासंभव कार्य में रूपांतरण। स्वामी विवेकानंद की वैश्विक स्तर पर पहचान - THE HINDU MONK OF INDIA ।पर उनको सबसे ज्यादा प्यार था - पुण्यभूमि भारत और दरिद्रनारायण से। उन्होंने हमें गुरुमंत्र के रूप में दिया - स्वदेश मंत्र!!
उनकी सारी योजनाओं के केन्द्र में रही भारत जननी और उनके प्रिय आशास्पद कार्यकर्ता - युवा, युवा, युवा!
स्वामी विवेकानंद ने कहा था -
"जब तक लाखों लोग भूखे और अज्ञानी हैं तब तक मैं उस प्रत्येक व्यक्ति को कृतघ्न मानता हूँ जो उनके बल पर शिक्षित हुआ और अब वह उसकी ओर ध्यान नहीं देता "

हम सब इस बात से सहमत होंगे कि हमारे देश में असमानता की खाई बहुत गहरी और चौङी है।आंकङे यह बताते हैं कि हर तिसरा आदमी गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन करने को मजबूर है। फिर जहां भोजन, पानी व आवास की सही और समुचित व्यवस्था नहीं है, वहाँ पर शिक्षा की स्थिति पर सोचने पर ललाट पर चिंता की रेखायें खिंचनी स्वाभाविक है। भारत की आर्थिक राजधानी में एशिया का सबसे बड़ा स्लम है। कलकत्ता, चेन्नई और दिल्ली की भी यही दशा हैं। महानगरों में दैनिक मजदूरी पर आश्रित परिवारों के बच्चों का भविष्य केवल शिक्षा ही सुधार सकती है। परन्तु शिक्षा की व्यवस्था??
अपर्याप्त। स्वामी जी के दरिद्रनारायण? उपेक्षित! सरकारी तंत्र की अपनी मजबूरी और व्यवस्थागत समस्याएं हो सकती है। परन्तु क्या हम भी मजबूर मानते हैं स्वयं को?? क्या अज्ञान के गहन अंधेरे में भटकता प्यारे भारत का भविष्य वह कृषकाय बालक हमें झकझोरता नहीं? जिन तोतली जुबानों से ककहरा दोहराया जाना चाहिए वे ग्राहकों से खाने का आर्डर मांगते समय हमें धिक्कारते नहीं?? क्या महापुरुषों के जन्मदिन और पुण्यतिथि पर इन बच्चों में बिस्कुट, चॉकलेट, खिर, जलेबी आदि बांट कर और उनसे ताली बजवाकर हम संतुष्ट हो सकते हैं??
हम अगर यह पढ सकते हैं तो शिक्षित हैं। हां, इस दौर में एक विद्यार्थी के रूप में हमारे सामने हमारे अपने भविष्य निर्माण की चुनौती है। कठिन समय है। हम अभी बेरोजगार भी हो सकते हैं मगर सच यह भी है कि हम बेकार नहीं हैं। हमारे पास शिक्षा है, इसे हम कुछेक घरों में बांट सकते हैं। कुछ को अंधेरे से बाहर निकाल सकते हैं। सच मानिये खोजने से हमारे आसपास ऐसे बच्चे हैं जिन्हें हमारी जरूरत है। बहुत जरूरत है। हम अपने मनोरंजन के समय का सदुपयोग एक अच्छे भारत के भविष्य निमार्ण के लिए कर सकते हैं। हम सिर्फ एक छोटे भाई या बहन को एक घंटे रोज पढाने का अणुव्रत ले लें तो हमारे महापुरुषों के, हमारे अपने,सपनों का भारत अवश्य अवतरित होगा। भारत एकदिन विश्व गुरु अवश्य बनेगा। बस उस महान प्रकाशपूंज में एक दीप हम भी हों। हमे यह सुनिश्चित करना होगा। स्वामी विवेकानंद की जयंती पर हम यह वादा स्वयं से करें - एक दिन, एक घंटा, एक भविष्य, एक भव्य भारत के लिए!!
स्वामी विवेकानंद के द्वारा कठोपनिषद की वह वाणी - उत्तीष्ठत् जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत, हमारा आह्वान कर रही है। उठो, जागो और लक्ष्य की प्राप्ति तक मत रूको।
पूरे भारत को शिक्षा के प्रकाश पूंज से आलोकित करने के ध्येय से , आओ साथी दीप बनें...
आप सभी का यह सुस्वप्न पूर्ण हो, प्रयास को उत्साह का वातावरण और साधना को आवश्यक साधन मिले माँ भारती से इसी प्रार्थना के साथ आप सभी के अन्दर स्थित प्रज्ञ आत्मा को मैं प्रणाम करता हूँ।

उत्तीष्ठ भारतः

शुक्रवार, 18 नवंबर 2016

काले धन के लिए कीमोथेरेपी है डिमोनेटाइजेशन

छठ पूजा के बाद गांव से लौट रहे थे। 9 तारीख की अलसुबह बस पकड़ी थी सिवान के लिए। सभी सवारी बस कंडक्टर को किराय दे रहे थे। बहुत से लोगों ने ₹500 का नोट दिया था। छुट्टा नही होने बाद भी आदतन कंडक्टर ने नोट ले लिया। बस महराजगंज पहुंची। “भाई हमारे बाकी के पैसे लौटाओ जल्दी, हमे उतरना है“। सभी कहने लगे। कंडक्टर छुट्टा कराने के लिए गया। थोड़ी देर में लौटते ही ₹ 500 के नोट देने वाले सभी सवारियों को यह कहकर लौटाने लगा कि” नहीं चलेगा भई ये नोट, कोई दुकानदार नही ले रहा है। सुना है कि ई पंसउआ आ हजार के नोट बंद कर दिया है सरकार ने “। बस में बहुत से लोगों को पता था। पर मैं अनभिज्ञ था। अब गांव में बिजली नही आती।सोलर पैनल पर आश्रित बहुत-सी मोबाइलें विरोध का झंडा न उठा लें इसलिए काम भर ही सेवा लेता हूँ। मोबाइल देखने के ही काम में आता है ज्यादातर। फिर इन्टरनेट से तो बैट्री भी जल्दी खत्म हो जाती है। सुबह जाना है सो रात को जल्दी सो गया था। राष्ट्र के नाम प्रधानमंत्री का संबोधन नहीं सुन पाया था।

तभी “पंसउआ बंद! पंसउआ बंद!! कहता हुआ एक 14-15 साल का किशोर साइकिल पर पेपर बांधे आ रहा था।
” भाई एक प्रभात देना “
पहला पन्ना और हेडलाइन कंडक्टर की बात के साथ सहमत थे। ईकोनामिक्स ग्रेजुएट होने के कारण दिमाग में कौंधा -” अरे ये तो डिमोनेटाइजेशन हो गया! “
कल तक जिसे पढा था आज उसी के कारण मेरे जेब में रखे ₹500 के 4 और ₹1000 के 2 नोट अब बस रंगीन चमकदार कागज बन गए हैं। छोटे नोट रखने की आदत ने बचा लिया।

वास्तव में डिमोनेटाइजेशन या विमुद्रीकरण ईकोनाॅमी में उपलब्ध करेंसी या मुद्रा का लिगल टेंडर की वैधता समाप्त कर देने को कहा जाता है। जब कभी नियामक संस्था को ऐसा लगता है कि जाली नोटों, मनी लॉन्ड्रिंग व अवैध रूप से वृहत्तर स्तर पर मुद्रा का लेन देन, जिससे राष्ट्रीय अर्थतंत्र को क्षति पहुंच रही हो तो सरकार एक नोटिस जारी कर पुराने नोटों को नये नोटों में बदल देती है। इसमें सरकार, केंद्रीय बैंक (हमारे देश के संदर्भ में रिजर्व बैंक आॅफ इंडिया), आर्थिक सलाहकार सभी की योजना पर सहमति ली जाती है।

अगर हम भारत को 8 नवंबर 2016 की 12 बजे रात तक की अर्थव्यवस्था में ₹500 और ₹1000 के नोटों की चलन को देंखे तो रिजर्व बैंक के रिपोर्ट 2015-16 के अनुसार यह 86% रही है। भारत की REAL GDP (2015-16 )113.5 लाख करोड़ रुपए है। ₹500 & ₹1000 के बैंक नोट की एकाउंटेंड वैल्यू भारत के रियल जि डि पी के लगभग 12% के बराबर हो रही है!! हम हम समझ सकते हैं कि ये बैंक नोट हमारी इकॉनमी के कितने बङे हिस्से में ‘इंटिग्रल पार्ट’ की तरह है! हम सभी जानते हैं कि भारत में भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्रवाई के लिए लंबे समय से विभिन्न संस्थाओं और संगठनों द्वारा आंदोलन किया जा रहा है। मांग की जा रही है। यह सबसे आकर्षक मुद्दा रहा है, चुनावों का। विभिन्न विशेषज्ञों द्वारा सरकारों को परामर्श दिया जाता रहा है कि सभी बङे नोटों को समाप्त कर दिया जाए परन्तु हमारी अर्थव्यवस्था इतनी बड़ी है कि सभी बङे नोटों को समाप्त करने से बहुत सारी टेक्नीकल समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है। इसलिए सरकारें ऐसा करने से बचती रही हैं। परन्तु इस सरकार ने एक नये बङे नोट (₹2000) को जारी कर एक साहसिक कदम उठाया है। इस कदम से हमारी इकॉनामी पर क्या प्रभाव पड़ेगा इस पर हम संक्षिप्त रुप में बात करेंगे। हालांकि मैं कोई अर्थशास्त्री नही हूँ। एक अर्थशास्त्र स्नातक मात्र हूँ। जो पढा है और गांवों, शहरों व कोलकाता महानगर के लोगो को व विभिन्न प्रकार के बाजारों को देखा है, कभी क्रेता के रूप में तो कभी किसी प्रोजेक्ट पर काम करते हुए, उसी आधार पर बात किया जाएगा।

इस डिमोनेटाइजेशन से देश के आर्थिक स्वास्थ्य पर क्या असर पड़ेगा? मुझे ऐसा लगता है कि इससे देश का आर्थिक स्वास्थ्य सुधरेगा। हमारी अर्थव्यवस्था में एक और समानान्तर अर्थव्यवस्था अवैध रूप से चलती है जिसे हम लोग काले धन की अर्थव्यवस्था कहते हैं। यह काला धन अर्थतंत्र का कैंसर है। आप पाठकों की रूचि विशेषकर इसी कैंसर के इलाज अथवा प्रभाव पर ज्यादा होगी। स्वाभाविक भी है। हाॅट टाॅपिक और ट्विटर ट्रेंड जो है।

एक बात स्पष्ट है कि काला धन कितनी मात्रा में हमारी इकॉनामी में है, इसका अंदाजा ही लगाया जा सकता है परन्तु निश्चित कहना लगभग नामुमकिन है। तो आप भी सोचिये और अंदाजा लगा लिजिए। ध्यान रहे कि काला धन सिर्फ नगदी में ही नही होता यह ‘मेटल (सोना, चाँदी, प्लेटिनम आदि) गहने, रियल एस्टेट प्रापर्टी में निवेश, स्विस एकाउंट, विदेशी मुद्रा, आदि के रूप में भी रहता है। स्पष्टतः काला धन माने सरकारी एजेंसी की नजर से छुपा कर टैक्स नही दिया हुआ धन। अब हो सकता है कि आपके दिमाग में वह गरीब माँ अथवा पिता आयें जो अपने बच्चों के लालन – पालन व शिक्षा के लिए भी नकदी के रूप में पैसा अपने पास रखते हैं। साधारणतया यह राशि ₹ 2.5 लाख से कम होती है या कृषि कार्य व विपणन द्वारा अर्जित की जाती है। दोनों ही कर मुक्त हैं सो हमे चिंता करने की जरूरत नहीं कि हमारी खुन पसीने की गाढी कमायी “काला धन” कहलायेगी! जिनकी अन्य स्रोतों से इससे ज्यादा राशि नकदी जमा है वो अपना स्रोत बता कर अपने नकदी को वैध ठहरा ही सकते हैं।
अस्तु, काला धन निकालने के लिए या तो काला धन जिनके पास है (व्यक्ति या संस्था) वो स्वयं ही घोषित कर दें (VDIS – Voluntarily Discloser of Income Scheme) या सरकारी संस्थायें खोजे, पकड़े और कानूनी कार्रवाई करें या फिर वे काले धन जिस मुद्रा के रूप में संग्रहित है सरकार उसे ही अवैध घोषित कर दे। मेरी समझ से ये तीन रास्ते हैं। सरकार ने 30 सितम्बर 2016 तक स्वयं घोषणा करने का मौका दिया। लोगों ने किया भी। सरकारी एजेंसियों के द्वारा भी काम किया जा रहा है परन्तु इतनी बड़ी रकम जो एक समानांतर अर्थव्यवस्था का रूप ले चुकी हो के लिए यह आटे में नमक के बराबर है। सो तीसरा रास्ता नोटों को अवैध करार देना इन दोनों कदमो के बाद उपयुक्त लगता है। हालांकि यह भी 100% काला धन का उन्मूलन नही कर सकता क्योंकि डिमोनेटाइजेशन नकदी राशि के उपर ही लागू हो रहा है जो ₹500 & ₹1000 के नोट के रूप में हैं। परन्तु ये नोट भी तो 86% चलन में हैं!!अन्य नोटों और रूपों में संग्रहित काला धन अभी भी रह जाएगा। परन्तु जो राशि अवैध हुई वह बहुत बड़ी है और इससे हमारे मानिट्री पॉलिसी और फिसीकल डेफिसीट पर प्रभावी और सकारात्मक असर पड़ेगा। जैसे सिर्फ कीमोथेरेपी देने से कैंसर ठीक नहीं हो जाता उसी प्रकार सिर्फ ₹500 & ₹1000 के नोटों का डिमोनेटाइजेशन कर देने से ही पूरा काला धन अनुपयोगी नही हो जाएगा। इसके अन्य रूप बचे रहेंगे। सरकार की प्रतिबद्धता, साहसिक और सुनियोजित कदम, समाज का सहयोग, वैश्विक संस्थाओं के सहयोग और सबसे बड़ी बात इस देश के हर नागरिक के अपने राष्ट्रीय अर्थतंत्र के प्रति इमानदारी की प्रवृत्ति ही इस कैसर को समाप्त कर सकती है। जो अभी बहुत दूर है। अभी तो यात्रा शुरू ही हुई है। हम बस थोड़ी और बात करेंगे। सामाजिक और सबके जीवन पर होने वाले प्रभावों पर अतिसंक्षिप्त बात होगी।
डिमोनेटाइजेशन के कारण सभी लोग अपनी राशि बैंको में जमा कर रहे हैं। IT डिपार्टमेंट की सब पर नज़र हैं। इससे लेन देन का डिजिटाइजेशन भी हो रहा है। अनएकाउंटेड राशि भी एकाउंटेंड राशि में बदल रही है। जो काला धन वाले नगदी जमा कर रहे हैं। उनसे टैक्स के साथ-साथ 200% जुर्माना भी लिया जाएगा। मतलब साधारण अंकगणित के हिसाब से 90% तक धन सरकारी खजाने में चला जाएगा और 10% उनके पास बचेगा।

इस जमा से क्या लाभ होगा??

*जितनी ज्यादा राशि जमा होगी उतना ज्यादा हमारा Monetary base expand होगा ।बैंको में Money Supply बढेगी ।स्पष्टतः LOANABLE राशि बढेगी। अगर हम IS-LM MODEL के money market concepts से ही समझना चाहें तो यह कह सकते हैं कि मनी सप्लाई बढने से rate of interest घटेगा ।इससे investment बढेगा।

*जब investment बढेगा तभी आधारभूत संरचनाओं का विकास होगा। अत्याधुनिक तकनीक, उपकरण आदि हमारे skilled Labour force को मिलेगा। जो कामगार आबादी अकुशल है उन्हें कौशल अर्जन करने के सस्ते दामों में अवसर प्राप्त होंगे। आर्थिक विकास के नये आयाम स्थापित होंगे।

*इस जमा होती राशि से ब्याज दरों के Natural equilibrium में आने की पूरी संभावना है। इससे सबसे ज्यादा लाभ किसे होगा यह दृष्टिकोण पर और भविष्य की योजनाओं पर निर्भर करेगा। परन्तु साहूकारों के चंगुल से आबादी का कुछ हिस्सा छुट कर बैंक से निकटता स्थापित कर पायेगा क्योंकि बैंक भी लोन देने के लिए ग्राहकों की खोज में रहेंगे। गांवो, छोटे व मध्याकार शहरों की साधारण जनता लाभान्वित होगी।

*अगर किसान इस सस्ते ब्याज दर का लाभ उठा पाते हैं तो उनकी आत्महत्या में कमी आयेगी।

*नये-नये स्टार्ट अप को मदद मिलेगी। नवोन्मेषी उद्यमियों के नये वर्ग का उत्थान होगा।
*प्लेसमेंट होगा कि नही, यह ठीक नहीं है परन्तु आशा के आधार पर जो लाखों विद्यार्थी शिक्षा ऋण लिये हैं। उनकी बोझ यह कमने वाला ब्याज दर कम करेगा। जो ऋण लेने की कतार में खड़े हैं, उन्हें सहूलियत होगी। कारण बैंक विश्वसनीय ग्राहक की खोज में रहेंगे।

*INVESTMENT बढने से कामगार आबादी की आय बढेगी। मतलब जीवन स्तर उन्नत होगा। फिर एक नये Saving – investment cycle में हमारी अर्थव्यवस्था प्रवेश प्रवेश करेगी जो उत्तरोत्तर विकास करती जाती रहनी चाहिए। (कोई वैश्विक आर्थिक संकट या आयल इकोनॉमी में समस्या न आये तब)

*नकदी के रूप में छिपाये गये काले धन की formal economy में शामिल होने पर टैक्स कलेक्शन बढेगा अर्थात सरकार की आय बढेगी। इससे हमारा देश जिस fiscal deficit से भुगत रहा है वह कम होगा।

*अगर लंबे समय तक टैक्स कलेक्शन ऐसे ही इमानदारी सेे होता रहा और बढता रहा (बढता रहेगा क्योंकि economy expand करती है) तो TAX RATE और TAX BRACKET में एक रेशनल संबंध स्थापित होगाजिसका लाभ मेरी आयु वर्ग के युवाओं को ज्यादा होगा जो अभी भी कामगार आबादी में शामिल नही हुए हैं परन्तु 5-6 सालों में होगें।

*रियल एस्टेट को काला धन का स्रोत और गंतव्य दोनों कहा जाता है। कटु सत्य है। डिमोनेटाइजेशन से अब फ्लैट के दाम गिरेंगे। कारण नकदी हस्तांतरण पर नज़र। जो 30-40% नगदी लेन देन होता रहा है। उस पर रोक लगेगी। अन्य विवरणों में जाने से बात बङी हो जाएगी।

*फ्लैट के दाम कमने से शहरी निम्न मध्य वर्ग  अपने फ्लैट के सपने सच होने के आशा को बल मिलेगा।

इस डिमोनेटाइजेशन के विभिन्न आर्थिक लाभों की और गहराई में जाया जा सकता है परन्तु अब हम थोड़ी सीबिंदूवार नजर समाज में होने वाले परिवर्तन पर डालेंगे :-

*इस डिमोनेटाइजेशन ने हवाला कारोबार का दिवाला निकाल दिया।

*आतंकवादीयों की फंडिंग लाइन कट गई। काश्मीर सांस ले रहा है अभी। जो रूपये भविष्य में विभिन्न जगहों पर आतंकी गतिविधियों के लिए रखी गयी थी वो ज्यादातर बङे नोट में रहती है, सब कागज की ढेर हो गयी। एक सप्ताह में नोट बदलने की अधिकतम सीमा तय होने से साधारण आदमी तो ठीक है पर ये लोग इन 5-6 सप्ताहों में कितना बदलेंगे। इस बदलने की प्रक्रिया में स्लीपरसेल्स भी सामने आयेंगे। पहचान पत्र के कारण। जिन पर एजेंसियों को शक होगा उनके ट्रांजैक्शन इसे मजबूत करेंगे।

*नक्सलियों की नाक भी माटी के उस गड्ढे में दब गयी है जहां पर जबरन वसूली और विदेशी फंड दबा कर रखे रखे गए हैं।

*चुनावों में मतदान और मतदाताओं को प्रभावित करने के लिए जिन राशियों का प्रयोग होता वो बेकार। अब उस स्तर पर धन का अवैधानिक प्रयोग नही किया जा सकता है जितना बेहिसाबी होता था। हम एक तुलनात्मक रूप से अच्छे ओर फेयर चुनाव की बात सोंच सकते हैं।

*नकली नोटों के सप्लाई से Economic attack करने वाला बांग्लादेश – पाकिस्तान मुंह ताकता रहेगा। isi योजनाओं के पेपर से हवा करेगी। जाली नोट की समस्या से कुछ हद तक इस डिमोनेटाइजेशन ने निजात दिलायी।

*इन नकली नोटों से नाइजीरियाई देश अफ्रीका के देशादि भारत में खुब ड्रग्स के बाजार में पैठ बनायी हुई थी। अब ड्रग्स महंगे हो सकते हैं। ये कारोबार बुरा फंसा हुआ है डिमोनेटाइजेशन से।

*असामाजिक तत्वों की फंडिंग पर प्रभाव जिससे सामाजिक सौहार्द और शांति बनाये रखने में प्रशासन को मदद मिलेगी।

*अंधाधुंध धर्मांतरण में लगी देशी-विदेशी शक्तियों के कमर टूट चुके हैं। गरीब, सीधे मन वाले वनवासी इनके चंगुल में फंसने से बचेंगे।

*राष्ट्रीय सुरक्षा और संरक्षा के लिए घातक तथा देश के विकास में बाधक लाॅबिंग करने वाली शक्तियाँ कमजोर होंगी।

*विदेशी पूंजी और उनके इशारे पर चलने वाले एन जी ओ और मिशनरी विदेशी पूंजी के दम पर भारत में सामाजिक अस्थिरता लाने के लिए जिस तरह काम कर रहे थे उस पर नकेल कसा गया।
ऐसे अनेक प्रत्यक्ष और परोक्ष लाभ सज्जन समाज को मिलेगा। काले धन के कैंसर के लिए यह डिमोनेटाइजेशन एक असरकारी कीमोथेरेपी है। परन्तु समूल नाश के लिए हमारी आर्थिक व्यवहार की संस्कृति में परिवर्तन की आवश्यकता है और अभी काले धन और काले मन के अन्य रूपों पर और भी आक्रामक ओर प्रभावी प्रहार की नितांत आवश्यकता है। इस यात्रा की शुरुआत का यह एक ईमानदार कदम हैं। युद्ध स्तर पर काम कर रहे सभी बैंक कर्मियों, टकसाल कर्मी, नोटों के परिवहन में लगी संस्थाओं, इसकी सुरक्षा सुनिश्चित करने वालों और लंबी लाइन में लग कर इस आवश्यक परिवर्तन का सोत्साह समर्थन करने वाली इस देश की अबालवृद्धनरनारी को हार्दिक धन्यावाद देते हुए आपके अन्दर स्थिति प्रज्ञ आत्मा को मैं प्रणाम करता हूँ।

उत्तीष्ठ भारतः